ध्वनि और वर्ण

ध्वनियों का उच्चारण करते समय हम मुँह के निम्न अंगों को काम में लाते हैं:
. ओंठ (दोनों) . दाँत (ऊपर के) . वर्त्स (मसूड़ा), कठोरतालु (वर्त्स के पीछे का कठिन भाग) . मूर्द्धा (कठोरतालु कोमल तालु का मिलनस्थल) कोमलतालु (मूर्द्धा के पीछे का कोमल भाग) अलिजिह्वा या कौआ (कोमल तालु के अंतिम छोर पर लटकता हुआ मांस खंड) जिह्वा . स्वरयंत्रावरण १० उपालिजिह्वा (गलबिल) ११ स्वरयंत्र १२ काकल (स्वरयंत्रमुख)

फेफड़ों से आनेवाली वायु और इन अंगों की सहायता से सभी ध्वनियों का उच्चारण होता है

हिन्दी की ध्वनियाँ

उच्चारण की दृष्टि से हिन्दी की ध्वनियाँ दो प्रकार की हैं - स्वर और व्यंजन
स्वर : , , , , , , , , , ,

व्यंजन

'' वर्ग -
'
' वर्ग -
'
' वर्ग - (ड़ ढ़)
'
' वर्ग -
'
' वर्ग -
अन्तस्थ -
ऊष्म -
मिश्र व्यंजन : क्ष (क्+), त्र(त्+), ज्ञ (ज् + ), श्र (श् + )
अयोगवाह : '.' (अनुस्वार) ':' (विसर्ग)

वर्णों का उच्चारण

क्योंकि - '.' और ':' स्वर या व्यंजन नहीं हैं, फिर भी उनके साथ आते हैं इनके अतिरिक्त ' ' चन्द्रबिन्दु का प्रयोग केवल स्वरों के साथ होता है, जैसे- अँ आँ इँ उँ ऊँ एँ सभी व्यंजन अलग रूप में साधारणतः आधा उच्चरित हो पाते हैं पूर्ण रूप से उच्चरित होने के लिए इनके साथ '' मिलाना पड़ता है, जैसे - = क् + आधा रूप 'क्' हलन्त लगाकर दिखाया जाता है
अरबी-फारसी-तुर्की से आगत शब्दों में ज़ ध्वनियाँ उच्चरित होती हैं अंग्रेजी से आगत शब्दों में ज़ का भी उच्चारण होता है

स्वर और व्यंजन

स्वर: 'स्वर' वे ध्वनियाँ हैं जिनके उच्चारण में मुख विवर से बाहर आती हवा का कहीं कोई अवरोध नहीं होता
व्यंजन: व्यंजन वे ध्वनियाँ हैं जिनके उच्चारण में मुखविवर से बाहर आती हवा का कहीं कहीं पूर्ण या आंशिक अवरोध होता है

मात्राएँ

स्वरध्वनि

मात्रारूप

उदाहरण

स्वरध्वनि

मात्रारूप

उदाहरण

का

को

ि

कि

कौ

की

अनुस्वार

कं

कु

विसर्ग

:

कः

कू

चन्द्रबिंदु

आँ, हाँ

कृ

 

 

 

के

 

 

 

कै

 

 

 

 

'' के साथ लेखन में और मात्राओं का योग क्रमशः 'रु' और 'रू' के रूप में होता है

कुछ वर्णों के रूप

यहाँ ध्यान देना है कि कुछ वर्ण और अंक दो-दो रूपों में लिखे जाते हैं कुछ के रूप सर्वमान्य हैं जिन्हें मानक रूप कहते हैं कुछ रूप ऐसे प्रचलित हैं उनको मानकेतर रूप कहते हैं सबको मानक रूपों का ही प्रयोग करना चाहिए

मानक रूप

मानकेतर रूप

मानक रूप

मानकेतर रूप

क्ष

क्ष

 

अर्द्धव्यंजन वर्ण

हिन्दी में अर्द्धव्यंजन वर्णों के रूप चार प्रकार से बनते हैं:
. कुछ वर्णों का हुक हटाकर -
. कुछ वर्णों की खड़ी पाई हटाकर - ,
. कुछ वर्णों के नीचे हल् चिह्न लगाकर - ङ् ट् ठ् ड् ढ् ह्
. '' के विशेष रूप - _ (क्र), ' (र्क), (ट्र)

स्वरों का उच्चारण

स्वरों के उच्चारण में जिह्वा ही सक्रिय रहती है कभी जीभ का अगला भाग, कभी मध्य भाग या कभी पिछला भाग उच्चारण में सहायक होता है इस प्रकार स्वरों के तीन भेद होते हैं:
- अग्र स्वर - , ,
- मध्य स्वर -
- पश्च स्वर -

स्वरों में लगने वाला समय

स्वरों के उच्चारण में लगनेवाले समय के आधार पर स्वर दो प्रकार से उच्चरित होते हैं:
- ह्रस्व स्वर -
- दीर्घ स्वर -

ह्रस्व स्वरों के उच्चारण में कम समय लगता है दीर्घ स्वरों के उच्चारण में ह्रस्व स्वरों की तुलना में दुगुना समय लगता है '' का उच्चारण स्वर होकर व्यंजन 'रि' की तरह होता है, फिर भी वर्णमाला में यह स्वर के रूप में गृहीत है इसे ह्रस्वस्वर माना जाता है

व्यंजनों का उच्चारण

व्यंजनों के उच्चारण में उनके स्थान और उच्चारण की चेष्टाएँ या प्रयत्न मुख्य होते हैं
- उच्चारण स्थान : ओंठ, दाँत, वर्क्स, मूर्धा, तालु कण्ठ और काकल स्थान हैं इनके आधार पर व्यंजन द्योष्ठय, दन्त्योष्ठय, दन्त्य, वत्स्र्य, मूर्धन्य, तालव्य, कण्ठ्य और काकल्य होते हैं
- उच्चारण प्रयत्न : फेफड़ों से आनेवाली हवा को विभिन्न रूप देने के लिए उच्चारण अवयव जो प्रयत्न करते हैं उन्हें उच्चारण प्रयत्न कहते हैं
स्पर्श, स्पर्शसंघर्षी, नासिक्य, पार्श्विक, लुण्ठित, उत्क्षिप्त, संघर्षी और अर्द्धस्वर प्रयत्न हैं

विभिन्न प्रयत्न ध्वनियाँ

(i) स्पर्श - मुख विवर में दो स्थानों को 'स्पर्श' कहते है अतएव , , , आदि स्पर्श ध्वनियाँ हैं
(ii)
स्पर्श संघर्षी - मुखविवर में हवा के रुकने के बाद घर्षण के साथ बाहर निकलने को 'स्पर्शसंघर्षी' कहते हैं, जैसे :- , , ,
(iii)
नासिक्य - हवा के नासिका मार्ग से निकलने से 'नासिक्य' ध्वनियाँ उच्चरित होती हैं, जैसे - , , , ,
(iv)
पार्श्विक - हवा के जिह्वा के किनारे (पार्श्व) से होकर निकलने से 'पार्श्विक' ध्वनियाँ उच्चरित होती हैं, जैसे :-
(v)
लुण्ठित - जीभ का अग्रभाव मसूड़े के पास दो तीन बार हिलने से लुण्ठित ध्वनि उच्चरित होती है, जैसे -
(vi)
उत्क्षिप्त - जीभ की नोंक उलटकर कठोर तालु से टकराकर आगे की ओर फेंकी जाने से उत्क्षिप्त ध्वनियाँ उच्चरित होती हैं, जैसे :- ड़

संघर्षी अर्द्धस्वर

(vii) संघर्षी - मुख का मार्ग संकीर्ण होने से हवा घर्षण (रगड़) खाकर निकलने से संघर्षी ध्वनियाँ उच्चरित होती हैं ऐसी स्थिति में हवा में उष्णता आने से इन्हें 'उष्म' ध्वनि भी कहते हैं , , ऐसी ध्वनियाँ हैं
(viii)
अर्द्धस्वर - इनके उच्चारण में स्वर और व्यंजन दोनों के लक्षण मिलते हैं, जैसे- और

प्राणत्व और कम्पन

व्यंजनों के उच्चारण के और दो आधार भी हैं (i) प्राणत्व और (ii) स्वरतंत्रियों में कम्पन
(i)
प्राणत्व या श्वास प्रवाह में शक्ति या मात्रा के आधार पर ध्वनियाँ अल्पप्राण या महाप्राण होती हैं अल्पप्राण है, महाप्राण है, प्राण ध्वनि है
(ii)
स्वरयंत्र की स्वरतंत्रियों में कम्पन के आधार पर ध्वनियाँ अघोष या सघोष होती हैं अघोष है, सघोष

व्यंजनों का वर्गीकरण

स्थान/प्रयत्न

प्राणत्व

द्व्योष्ठ्य

दन्त्य

मूर्धन्य

तालव्य

कण्ठ्य

काकल्य

स्पर्श

अल्प

,

,

,

 

,

 

स्पर्श

महा

,

,

,

 

,

 

स्पर्श संघर्षी

अल्प

 

 

 

,

 

 

स्पर्श संघर्षी

महा

 

 

 

,

 

 

नासिक्य

अल्प

 

पार्श्विक

अल्प

 

 

 

 

 

 

लुण्ठित

अल्प

 

 

 

 

 

 

उत्क्षिप्त

अल्प/महा

 

 

ड़, ढ़

 

 

 

संघर्षी

अल्प/महा

 

 

अर्द्धस्वर

 

 

 

 

 

 

 

आपका काम : इस चार्ट के आधार पर हिंदी ध्वनियों का लक्षण सहित विवरण लिखिए
जैसे - '' स्पर्श, द्व्योष्ठय, अघोष, अल्पप्राण ध्वनि है

अच्छी हिन्दी कैसे सीखें

हम अच्छी हिन्दी कैसे सीखें? इसके लिए सरल उपाय है हम ठीक से जान लें कि मातृभाषा ओड़िआ और हिन्दी कहाँ - कहाँ समान हैं और कहाँ भिन्न हैं उससे हिन्दी का सही उच्चारण करना और लिखना आसान हो जाएगा

पहली बात

हिन्दी और ओड़िआ में स्वर ध्वनियाँ और मात्राएँ लगभग समान हैं, कुछ फर्क है - उन पर ध्यान दें
दोनों भाषाओं में ह्रस्व और दीर्घ स्वर हैं देखने में ये बराबर लगते हैं, लेकिन इनका उच्चारण भिन्न होता है ओड़िआ बोलते समय ह्रस्व-दीर्घ उच्चारण पर ध्यान नहीं दिया जाता, जबकि हिन्दी भाषी इनका स्पष्ट उच्चारण करते हैं दीर्घ स्वर पर दुगुना समय लगाना चाहिए

हिन्दी ओड़िआ की तुलना में अधिक ह्रस्व होता है
ह्रस्व और दीर्घ स्वर के उच्चारण भेद का अभ्यास करें: कल - काल, रज - राज, कमल - कमाल; तिन - तीन, कि - की, दिन - दीन; कुल -कूल, बहुत - बहू, हूँ - हूँ
ओड़िआ में ह्रस्व स्वर और दीर्घ स्वर के उच्चारण में समान समय लगता है

'', '' और '' का उच्चारण

'' का उच्चारण हिन्दी में 'रि' जैसा और ओड़िआ में रु जैसा होता है, जैसे:- ऋषि (रिषि/रुषि), ऋतु (रितु/रुतु), अमृत (अम्व्रित/अमृत्त)

'', और '' हिंदी में मूलस्वर हैं तथा संयुक्तस्वर भी - (+) तथा ( + )
हिंदी मूलस्वर : ऐसा, ऐनक, पैसा, मैना, औरत, पौधा, मौत, लौटना इनका विशेष अभ्यास करना जरूरी है

हिंदी संयुक्ताक्षर - 'या' के पूर्व ( + ), ( + ) जैसा और ' /वा' के पूर्व ( + ), ( + ) जैसा उच्चरित होते हैं, जैसे - कन्हैया, दैया, नैया, भैया, कौआ, पौवा, हौवा
ओड़िआ में : और मूल स्वर नहीं हैं केवल इनके संयुक्त रूप - अइ, अउ ही उच्चरित होते हैं, यद्यपि लिखे जाते हैं

'' का उच्चारण

'' का उच्चारण हिंदी में नहीं होता, जबकि ओड़िआ में शब्द के आरंभ में, उपसर्गयुक्त होने पर तथा संयुक्त वर्ण होने पर उच्चारण होता है, जैसे - यमुना (यमुना/जमुना), संयोग (संयोग/संजोग), सूर्य (सूर्य/सूर्ज्य)

किन्तु हिंदी तथा ओड़िआ में शब्द की मध्य तथा अन्त स्थिति में का उच्चारण होता है ओड़िआ में के लिए अलग लिपि चिह्न है शब्द: काया (काया/काया), मायामय (मायामय/मायामय)

'', '' और संघर्षी ध्वनियाँ

का उच्चारण हिंदी में ही होता है जबकि ओड़िआ में और दो ध्वनियाँ हैं ओड़िआ का हिंदी में जैसा ही होता है, जैसे सरल, फल, हल, जल, कलकल आदि

का उच्चारण हिंदी में होता है जबकि ओड़िआ में होता है, जैसे- वन (वन/बन), वायु (वायु/वायु), कविता (कविता/कबिता) अंग्रेजी की ध्वनि को लिखने के लिए ओड़िआ में अलग लिपि चिह्न का व्यवहार किया जाता है
इन शब्दों का उच्चारण कीजिए और उच्चारण भेद पहचानिए: बहन- वहन, बार वार, बात वात, बजना - वजन

हिंदी और ओड़िआ दोनों में , , , वर्ण हैं लेकिन इनके उच्चारण में अन्तर है हिंदी में बोलते समय जीभ की नोंक को तालु के पास ले जाना पड़ता है बोलते समय जीभ दन्तमूल के पास चली जाती है निम्न शब्दों का उच्चारण करके अन्तर को समझें राशि, सीसा, श्मशान, सस्ता, शाम, साम (वेद)

'' का उच्चारण अधिकतर लोग '' जैसा कर देते हैं परन्तु कोशिश करके इसका मूर्धन्य उच्चारण किया जा सकता है, जैसे - धनुष, षष्ठी, शेष, अष्टम

'' सघोष है, पर शब्द के अन्त में सामान्य रूप से इसका अघोष उच्चारण हो जाता है, जैसे- ग्यारह, बारह, राह, स्नेह '' के पहले आनेवाले '' का (=ह्रस्व ) जैसा उच्चारण होता है; जैसे - कहना, नहर, पहले, पहचान, बहन, रहना का क्रमशः केहना, नेहर, पेहले, पेहचान, बेहन, रेहना, जैसा होता है

'क्ष', 'ज्ञ' और अयोगवाह

'क्ष' का उच्चारण हिन्दी में क्ष्ष जैसा होता है, जब कि ओड़िआ में इसका उच्चारण 'ख्य' है शब्द: चक्षु (चक्षु/चख्यु), परीक्षा (परीक्ष्या/परिख्या)
'
ज्ञ' का उच्चारण हिंदी में ग्य जैसा होता है, जैसे - यग्य, आग्या, प्रतिग्या आदि कुछ लोग ग्यँ या ज्यँ भी उच्चारण करते हैं

अनुस्वार () और विसर्ग (:) को सामान्यतः अं, अः के रूप में लिखा जाता है इन्हें स्वर माना जाता है और व्यंजन इसलिए इन्हें 'अयोगवाह' कहा जाता है अनुस्वार का उच्चारण इसके बाद के व्यंजन की नासिक्य ध्वनि की तरह होता है विसर्ग '' का अघोष रूप है विसर्ग का उच्चारण शब्द के अन्त में तथा उपसर्ग के अन्त में '' होता है जैसे प्रायः (प्रायह), विशेषतः

 (विशेषतः), अधःपतन (अधहृपतन) जबकि शब्द के मध्य में इसका उच्चारण नहीं होता, जैसे- दुःख (दुख)

शब्दों का उच्चारण

(i) दो वर्णों वाले शब्दों के अंतिम व्यंजन का उच्चारण हलन्त होता है; जैसे - काम, राम, बात, कम, बाल, छाल आदि
(ii)
तीन वर्णों वाले शब्दों का अंतिम व्यंजन हलन्त उच्चरित होता है; जैसे- कमल, कलम
(iii)
चार वर्णों वाले शब्दों की दूसरी और अंतिम व्यंजन ध्वनि हलन्त उच्चरित होती है; जैसे - झट्पद्, चम्चम, मलमल, कल्कल आदि
(iv)
अंतिम का उच्चारण नहीं होता